बिरह और यादें

Dear Age

Musical Night

आखिर कुसूर क्या था मेरा?

रात के सन्नाटे में,
जब अंधेरा था गहरा ।
दिल के दहलाने वाले दर्द ने,
उस काली रात से पूछा:

"क्यों, मुझे ही क्यों चुना तूने,
आखिर कुसूर क्या था मेरा?"

रात की तन्हाई ज़ोर से हंसने लगी,
बोली,

"अगर सुन पाए तो आज तू सुन,
मैं बतलाऊ कि कुसूर क्या था तेरा,
मगर ज़रा संभलना कहीं तेरे,
कानों से खून ना बह निकले।

अपने टूटे सपनों को,
उन खुदगर्ज रिश्तों से।
अपने खाली हाथों को,
उन झूठी सौगातों से।
अपने बेरंग ज़िन्दगी को
उन फीके रंगों से ।
बंजर सूखी आंखों को,
खून की नदियों से भरने चली।
यह था कुसुर तेरा।

तूने उड़ान भरने की कोशिश की,
जब की तू रौंदने के लिए बनी थी।
तूने अपना विश्वास गिरवी रखा वहां,
जहां सिर्फ झूठ का अस्तित्व था।

तूने अपना हाथ बढ़ाया वहां,
जहां हाथों की बलि चड़ती थी।
तू उस शहर में बसने गई,
जहां रिश्ते सिर्फ बिकते थे।

अरे जा, जा तू है कुसुरवार,
जो पैदा उस दुनिया में हुई,
जहां रिश्तों का व्यापार होता है,
और वायदे तोड़े जाने वाले खेल।

ज़िन्दगी में एक बार फिर तूने,
बेखौफ और सुहाने सपने पिरोए।
तूने एक ऐसे शख्स को ज़िन्दगी बनाया,
जिसके लिए तू सिर्फ एक और लड़की थी।

क्या कुसूर था तेरा,
तो सुन आज फिर बताऊं:

तेरा निश्चल विश्वास,
तेरी सच्चाई, तेरी मुस्कुराहट,
तेरे वायदे, तेरा इंतज़ार,
तेरा खुश होना, तेरा सुकून,
तेरा जीने की उम्मीद करना,
तेरा किसी के लिए मारना,
तेरा ढकोसले ना करना,
तेरा दिखावा ना करना,
तेरा धोखेबाज ना होना,
तेरा किसी के दर्द को अपना लेना,
तेरा किसी अपने के लिए दिल धड़कना,
तेरा किसी अपने के लिए सांसे चलना,
तेरा किसी को बेइंतहां प्यार करना,
यह सब था कुसूर तेरा।

जब तू बनाई ही गई थी पत्थर,
तो उस पत्थर में जान डालना था, कुसूर तेरा।"

स्नेहा