I Fell in Love

Today at night,
Walking on roof.
While strolling over,
I fell in love.

Yes, I fell in love,
With the dazzling city.
The view was amazing, 
As if twinkling stars in sky.

Peace of the silence,
Whispered in my ears,
Relax and enjoy,
You missed this all years.

Green, orange and yellow,
Waving me greetings.
Alone I was walking, 
Yet conversation started.

Shared with me,
Joys, passions, sorrows,
Needs, wants, lie, mistakes,
Fun, hope, dreams and few secrets.

Admiringly I asked,
The serene city. 

"Were you this beautiful,
Or I saw it today?
How peaceful and relaxing,
Blend of bricks and greenery."

The city smiled,
Pleasing winds answered.

"Was beautiful alike,
All these years. 
Its only you, 
who was blind.
Entangled in busy life
Schedule and deadlines.
Now your life is standstill,
So you fell in love with it."

- Sneha

धोखेबाजों का शहर

धोखेबाजों के शहर में,
एक बार मैंने घर बसाया।
सच्चाई नाम के सफ़ेद पर्दों से,
उन्होंने अपना घर सजाया। 

घर आओ, मिलकर रहेंगे,
कह मुझे फुसलाया।
मिठाईयाँ, शर्बत और खीर, 
सब मुझे मुसकुराकर खिलाया। 

फिर अपना बन कर, 
लुभावनी बातों से, 
अपना विश्वास जीत,
मुझे गले लगाया। 

अंत था,
हाँ वो अंत था मेरा। 
मेरे विश्वास का, मेरी सहजता का,
मेरी मासूमियत का, मेरे संघर्ष का।

गौर से देखने पर,
सब समझ मुझे आया। 

वो सफ़ेद पर्दे तो काले कफ़न थे,
मिठाईयाँ नमकीन व तीखी,
शर्बत तो मेरा ही ख़ून था,
और वो खीर, कड़वा ज़हर। 

जब इन सबको मैंने झेल लिया, 
तब बातों के बाण चलाए।
मैं गलत हूँ, कपट से भरी,
स्वयं के दिल में चोर होते हुए,
मुझे ही फरेबी बतलाया।

कर्मभूमि के भीष्म जैसे, 
फिर भी मैंने साहस रखा।
तब उन्होंने अपना,
आखरी दांव लगाया। 

माफ़ी और वादों की वर्षा कर,
मुझे फिर इस बार गले लगाया। 
उस दिन बच ना पाई, हार गई,
गिर गई, और आखरी सांस ली।

झूठों के उस शहर में, 
फिर एक कत्ल हुआ था।
मुखौटों ने इस बार, गले लगा कर,
मेरी पीठ पर खंजर जो घुसाया था।